क्या गैजेट्स का इस्तेमाल युवाओं को नुकसान पहुंचा रहा है।

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आधुनिक में ज़्यादातर लोग गैजेट्स पर निर्भर करते हैं। गैजेट्स ने एक और जहां सुविधाएं दी हैं वहीं यह युवाओं के लिए नुकसानदायक भी है। जो युवा गैजेट्स का इस्तेमाल अधिक करते हैं और लंबे समय तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम करते हैं, उन्हें ‘रिपिटिटिव इन्जरी’ होने की आशंका बढ़ जाती है। इस प्रकार से 80% मामलों का समाधान जिवनशैली में बदलाव से किया जा सकता है, जैसे अच्छे पोषण और भरपूर व्यायाम आदि अपनाकर।

रिपिटिटिव स्ट्रेस इन्जरी (आरएसआई) को बार-बार एक ही प्रकार की गतिशीलता और ओवर यूज़ की वजह से मांसपेशियों, ट्रेंडंस और नव्र्स में दर्द के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस स्थिति को ओवरयूज़ सिंड्रोम, वर्क रिलेटेड ऊपर लिंब के रूप में भी जाना जाता है। इस आयुवर्ग वाले अधिकतर लोग वर्किंग प्रोफेशनल होते हैं जो ऑफिस पहुंचने के लंबे दूरी तक यात्रा करके, ड्राइव करके पहुंचते हैं और इसके बाद पूरा दिन अधिकतर समय एक जगह बैठकर काम करते रहते हैं। जो कंप्यूटर या लैपटॉप पर काम करते हैं, लम्बी मीटिंग के लिए बैठते हैं और अपने मोबाइल पर उपलब्ध हो चुके सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं। घर पहुंचने के बाद यह लोग किताबें पढ़ने के लिए गैजेट का इस्तेमाल करते हैं और पढ़ते-पढ़ते सो जाते हैं।

 

युवा हो रहे हैं इस बीमारी के शिकार, गैजेट्स पहुंचा रहे नुकसान

स्क्रीन का इतना लम्बा एक्पोज़र बना सकता है इन बिमारियों का शिकार स्क्रीन का इतना लंबा और अनावश्यक एक्सपोज़र स्पाइन पर बेकार का तनाव डालता है और इससे लिगामेंट में स्प्रेन का ख़तरा बढ़ जाता है जो वर्टीब्रा को बंधकर रखता है, ऐसे में मांसपेशियों में कड़ापन आने लगता है और डिस्क में समस्या होने का ख़तरा बढ़ जाता है।

 

स्लिप डिस्क, रिपिटिटिव स्ट्रेस इन्जरी और सोर बैक का बढ़ता है ख़तरा

इंसान की रीढ़ को मूवमेंट के सपोर्ट के लिए डिज़ाइन की गई है और अगर यह इस्तेमाल में रहती हैं तो स्वास्थ्य बनी रहती है। आज के युवाओं को समस्या इसलिए हो रही है, क्यूंकि वह निष्क्रिय जीवनशैली जी रहे हैं, जिसमें गैजेट पर निर्भरता काफ़ी ज़्यादा बढ़ गई है। ज़्यादातर युवाओं में देखी जा रही आम समस्या है सार्वीकल स्पाइन और पीठ की, जैसे कि स्लिप डिस्क, रिपिटिटिव स्ट्रेस इन्जरी, सोर बैक और लिमामेंट की चोट।

 

डॉ. भनोट की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 12 महीनों में मेरे पास हर महीने औसतन 15.20 प्रतिशत ऐसे मरीज़ आ रहे हैं जो 40 साल से कम उम्र के होते हैं लेकिन उन्हें स्पाइन की गंभीर समस्या हो चुकी है और इनमें रिपिटिटिव स्ट्रेस इन्जरी सबसे ज़्यादा आम है।

 

डॉ. भनोट ने कहा कि इस मामले में सबसे ज़रूरी है समय पर समस्या की पहचान, जिससे मेडिकल और सर्जिकल इंटर्वेरशन की ज़रूरत कम पडती है और समस्या का समाधान जीवनशैली में बदलाव लागू किया जा सकता है। इसके तहत अच्छा पोषण, हल्का व्यायाम और नियमित अंतराल में थोड़ी-थोड़ी देर तक टहलकर सिटिंग टाइम को कम करके दिक्कतों को दूर किया जा सकता है।

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Written By

Tabassum Shah